चुनाव की नीली स्याही का राज जानें वोटर्स की उंगलियों पर लगाने में हर बूंद का खर्च


Indelible Ink: वोटर्स की उंगलियों पर लगने वाली स्याही की कीमत

Indelible Ink: इलेक्शन कमिशन यानी निर्वाचन आयोग पूरी तरह से चुनाव की तैयारियों में जुट गया है. इसी क्रम में आयोग ने वोटरों की उंगलियों पर लगाए जाने वाली नीली स्याही के लिए ऑर्डर दे दिए हैं. आयोग ने कुल २६ लाख स्याही की बोतल के लिए कंपनी को ऑर्डर दिए हैं. करीब ९० करोड़ लोगों पर इस्तेमाल की जाने वाली इस स्याही की कीमत करीब ३३ करोड़ रुपये होगी. आखिर क्या है इस नीली स्याही का राज, इसके हर बूंद पर कितना आता है खर्च, जानिए रिपोर्ट में..
स्याही की कितनी कीमत: सरकार ने कुल २६ लाख फाइल्स का ऑर्डर दिया है और हर बोतल में १० एमएल स्याही होती है. २६ लाख बोतल पर कुल खर्च ३३ करोड़ यानी हर बोतल पर करीब १२७ रुपये. इस लिहाज से १० एमएल की कीमत १२७ रुपये और १ लीटर की कीमत करीब १२,७०० रुपये होगी. वहीं एक एमएल यानी एक बूंद की बात करें तो १२.७ रुपये इसकी कीमत बैठेगी.

Indelible Ink: हर वोटर्स पर कितना खर्च देश में कुल ९० करोड़ वोटर्स के लिए ३३ करोड़ रुपये स्याही पर खर्च किया जा रहा है. इस लिहाज से हर वोटर को स्याही लगाने पर इस चुनाव में २.७ रुपये खर्च आएगा.
भारत में बनती है यह स्याही: यह स्याही भारत में ही बनाई जाती है. मैसूर पेंट एंड वार्निश लिमिटेड (MVPL) नाम की कंपनी इस स्याही का प्रोडक्शन करती है. कंपनी इसे रिटेल में नहीं बेचती है, कंपनी सरकारों या चुनाव से जुड़ी एजेंसियों को ही इसकी सप्लाई करती है. इसे लोग इलेक्शन इंक या इंडेलिबल इंक के नाम से जानते हैं. यह कई दिनों तक मिटाई नहीं जा सकती है, इससे वोटर चाहकर भी एक ही चुनाव में दोबारा वोट नहीं कर सकता. यानी इसका उद्देश्य चुनाव की प्रक्रिया पारदर्शी बनाना है.

नीली स्याही की खासियत: हाथ के साथ धातु, लकड़ी या कागज पर अगर स्याही लग जाए, तो लाख कोशिशों के बाद भी इसे तुरंत नहीं मिटाया जा सकता है. आम थिनर जैसे केमिकल का भी इस स्याही पर इस्तेमाल बेअसर होता है. कंपनी स्याही को कनाडा, कम्बोडिया, मालदीव, नेपाल, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका और टर्की जैसे देशो में भी एक्सपोर्ट करती है. कंपनी की शुरुआत मैसूर के तत्कालीन राजपरिवार की ओर से १९३७ में की गई थी. बाद में यह कर्नाटक सरकार के अधीन आ गई.