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आधुनिक युग और पंचकर्म चिकित्सा

वर्तमान आधुनिक युग यह मशीन युग है| क्यों कि इस युग में मनुष्य मशीन के अधिक संपर्क में है| जैसे कम्प्युटर, लेपटॉप, मोबाईल, टीव्ही, वाशींग मशीन, कार, मोटरबाईक, रेलगाडी, ऐरोप्लेन, मीक्सर, गैसस्टोव्ह आदि अनेक वस्तु जिनका वह रोजमर्श की  जिंदगी में उपयोग करता है तथा साथ ही साथ मनुष्य इनके बगैर अपना जीवन व्यतीत नही कर सकता है|
 परंतु एक जैसे कम्प्युुटर, मोबाईल, टीव्ही आदि देखने से वात प्रकोप होता है तथा वात दोष अस्थि(हड्‌‌डी) धातु में विकृति पैदा कर स्पॉंडिलाइटिस, स्लीपडिस्क, स्कॉलोलियोसीस (मेरूदंड की हड्डी तीरछी होना), फ्रोजन शोल्डर आदि रोग उत्पन्न करता है|
 एक ही ओर ध्यान एकत्रित कर कई  घंटो तक कम्प्युटर आदि देखने से ऑखो में चश्मा, लालीमा, खुजली आदि अन्य समस्याये उत्पन्न होती है साथ ही साथ चयापचय की क्रीया बीगड वायु विकृति हो पेट में जडता, अजीर्ण, बध्दकोष्ठता, पेट दर्द, आध्मान आदि उत्पन्न होता है| प्राचीन काल में मनुष्य ग्यारह नंबर की गाडी अर्थात अपने पैरो से ही चलता था परंतु कालचक्र अनुसार आज उसे गाडीयो का इस्तेमाल करना जरूरी है|ु इस वजह उसके शरीर का विष पसीने के रूप में बाहर नहीं आता है क्योंकि आराम पुर्वक वह सफर करता है| आरामपूर्वक जीवन व्यतित करने से उसका वजन तथा शरीर चर्बी बढ़ती जाती है तथा मोटापा उसे बेचैन कर देता है|
घर में गृहिणीयॉ वॉशीग मशीन, मीक्सर, गैसस्टोव्ह, माइक्रोव्हेव आदि अनेक उपकरणो का इस्तेमाल करती है जो आज युग में आवश्यक है परंतु इन कारणों से तैयार भोजन के गुणों में कमी आ जाती है तथा इससे रस रक्त आदि धातु विकृती होकर अनेक समस्यॉं  उत्पन्न होती है|
उपयुक्त तकलीफे केवल शारिरिक है परंतु दिमागी तकलीफ तो मनुष्य समझ ही नहीं पा रहा है| वर्तमान काल में मनुष्य अजीब सा तनाव महसुस करता है जो वह स्वंय समझ नही सकता परंतु इस वजह से उसकी पियुष ग्रंथी (पिटयुटरी ग्लैंड) प्रभावित होती है जो हमारे शरीर की मास्टर ग्लैंड होती है| इसकी विकृति से शरीर की अन्य ग्रंथीया विकृत होती है तथा परिणाम स्वरूप हायपर, थारराईड, हायपोथायराइड, पीसीओडी (अंडबीज विकृति), मधुमेह, हायपरटेंशन आदि अनेक बीमारियॉं उत्पन्न होती है| सेरेब्रल एट्रोफी सेरेब्रो वैयस्कुलर डिझिज, चिंता, क्रोध, भय,     लखवा,एन्झायटी, अनिद्रा, उन्माद, अपस्मार, विस्मृती, अवसाद आदि अनेक मानसिक रोग यह आधुनिक युग की उपज है|
आधुनिक युग में मनुष्य पंचकर्म चिकित्सा का उपयोग करता है तो उसके शरीर विकृत दोष बाहर निकल जाते है जिससे उसकी सप्तधातु बल्य होकर उसे अधिक लाभ मिलता है| शारिरीक तथा मानसिक दोषो का निर्हरण यह पंचकर्म द्‌‌वारा होता है तथा विशेष चिकित्सा पश्‍चात रोगो का पुन: उद्भव जीवन मै नही होता है|
 पंचकर्म - वमन, विरेचन, बस्ति, नस्य रक्त मोक्षण
पूर्वकर्म - स्नेहन, स्वेदन.
 स्नेहन - प्रथम पूर्वकर्म - इससे शरीर तंंरगे उद्रिदप्त होती है तथा रस, रक्त परिसंचरण बडता है फलस्वरूप बुढापा देरी से आता है तथा त्वचा वर्ण निखर (गोरापन) आता है|  मनुष्य बलवान हो जाता है तथा ऑखो की रोशनी बढ़ती है|
स्वेदन - इससे शरीर की प्रत्येक स्वेदग्रंथी अपना कार्य कर स्वेद निर्माण करती है फलस्वरूप शरीर जकडाहट दूर होती है तथा शरीर चर्बी पीघलने में मदद होती है|
वमन - शरीर का कफ दोष मुखद्वारा बाहर निकलता है| यह त्वचारोग,कफरोग तथा  हायपरएसीडीटी में उपयोगी है|
विरेचन - गुदा मार्ग से दोष बाहर निकलते है अर्थात शारिरिक दोष शरीर से बाहर फेक दिए जाते है|
बस्ति - इससे शरीर शुध्दिकरण तथा बृंहण दोनो कार्य होते है|
रक्तमोक्षण - दूषितरक्त जलौका तथा सिराद्वारा निकाला जाता है जिससे त्वचा रोग विद्रधी, खुजली, मुहासे आदि दुर होते है|
शिरोधारा - सिर पर तेल, दुध तथा काढे की धारा छोडी जाती है जिससे मानसिक तनाव दुर होता है| बंध्यत्व,मधुमेह, थायराईड में उपयोगी|
पंचकर्म के समय सफाई का अधिक ध्यान रखना चाहिए क्योकि इसमें एक व्यक्ति को एक ही वस्तु का प्रयोग करना चाहिए| पल्लवी पंचकर्म में आपको आपकी पुरानी समस्या का हल पूरी तरह आपको प्राप्त हो सकता है क्योंकि हम संयुक्त उपचार पध्दती प्रयोग करते है| आयुर्वेदिक भोजन, आवास, योगा, प्राणायाम, व्यायाम, नेचोरोथेरपी आदि अनेक चिकित्सा पल्लवी  पंचकर्म में होती है जो राजयोग चिकित्सा का आभास करती है|

Contributed by :
Dr. Mrs. P. S. Rane (Gangotri) B.A.M.S. N.D. C.G.O. - Family Physician, 271, Gajanan Society, Dattawadi, Nagpur. Mo. : 8087092297, 7721803608, E-mail : sp.rane@rediffmail.com  Web : www.pallavipanchkarma.com